मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों से कर्मचारियों के बिना अनुमति मिलने पर लगी ब्रेक ! बड़ा सवाल – समस्या के जनक ही क्यों देंगे मिलने की अनुमति ?

आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि जब निचले कार्यालय में समस्या का हल नहीं होता है तो थक हारकर कर्मचारी राजधानी रायपुर का रुख करता है और वरिष्ठ अधिकारी या विभाग के मंत्री को अपनी समस्या से अवगत कराता है अधिकांश मौके पर इससे समस्या का हल भी होता है और इसे अप्रत्यक्ष रूप से सिस्टम का एक्स-रे भी माना जाता है क्योंकि इससे उच्च अधिकारियों और मंत्रियों को यह पता चल जाता है कि उनके विभाग में लालफीताशाही किस हद तक हावी है और यदि कोई विभाग अपने ही कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है तो फिर आम जनता के साथ न्याय की उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं । इस मुद्दे पर हमने चर्चा इसलिए की है क्योंकि स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 14 जून को एक पत्र जारी हुआ है जिसमें एक पुराने आदेश को ही संदर्भित करते हुए यह कहा गया है कि कर्मचारी प्रॉपर चैनल से अनुमति लेकर ही वरिष्ठ अधिकारी और मंत्रियों से मिले और ऐसा न होने पर उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए लेकिन सवाल यह खड़ा होता है की यदि परेशानी खड़े करने वाले ही जिला या संभाग के अधिकारी हैं तो वह फिर मातहत कर्मचारी को उच्च अधिकारी या मंत्री से मिलने की अनुमति क्यों देंगे और अनुमति न मिलने की स्थिति में कर्मचारी के लिए कोई विकल्प क्यों तैयार नहीं किया गया है । पत्र में कहा गया है कि अक्सर कर्मचारियों के समस्या का निराकरण उनके विभागाध्यक्ष कार्यालय या जिला कार्यालय से हो सकता है लेकिन इस बात का कहीं पर भी जिक्र नहीं है कि यदि समस्या की जड़ ही विभाग कार्यालय या जिला कार्यालय है और जानबूझकर समस्या का निराकरण नहीं कर रहा है तो कर्मचारी कहां शिकायत करें । जबकि व्यवस्था यह बननी चाहिए कि यदि किसी कर्मचारी को किसी विषय को लेकर परेशानी है तो निर्धारित समय में उनके उच्च अधिकारी उसकी समस्या का निराकरण करें और यदि समस्या वास्तविक हो और उसका निराकरण न हो तो दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए न कि कर्मचारियों को अपनी समस्या बताने से रोकना चाहिए । बहरहाल देखना होगा कि कर्मचारी संगठन इस पत्र को किस तरीके से लेते है और इस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया आती है ।

