बिलासपुर संभाग

20 साल पुराने बलवा मामले में आरोपियों को हाईकोर्ट से राहत, जेल में बिताई अवधि को माना सजा

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बिलासपुर: खेती का काम करने वाले व्यक्ति को ‘चापलूस’ कहने से शुरू हुआ विवाद आखिरकार 20 साल बाद कानूनी मोड़ पर पहुंचकर थम गया। इस मामले में दोषी ठहराए गए आरोपियों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने लंबे समय से मामला लंबित रहने और आरोपियों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए जेल में बिताई गई अवधि को ही पर्याप्त सजा मान लिया। साथ ही आरोपियों को अर्थदंड की राशि जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘चापलूस’ शब्द से शुरू हुआ था पूरा विवाद

जानकारी के मुताबिक जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम धाराशिव निवासी विष्णु प्रसाद के घर 7 जुलाई 2005 को उनकी दादी हराबाई का वार्षिक श्राद्ध कार्यक्रम आयोजित था। कार्यक्रम में रिश्तेदार और ग्रामीण बड़ी संख्या में पहुंचे थे।

इसी दौरान खेती का काम करने वाले श्रवण राठौर ने विष्णु प्रसाद से शिकायत की कि नेगीराम ने उसे ‘चापलूस’ कहा है। उस समय विष्णु प्रसाद ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन शाम को उन्होंने नेगीराम से इस बारे में पूछताछ की।

पान दुकान के पास हुआ खूनी विवाद

पूछताछ के बाद मामला शांत हो गया था, लेकिन रात में स्थिति अचानक बिगड़ गई। विष्णु प्रसाद अपने साथियों महारथी, विनोद और संतोष के साथ गांव की पान दुकान पहुंचे थे, तभी कई लोग वहां इकट्ठा हो गए और गाली-गलौज शुरू कर दी।

विवाद बढ़ने की सूचना मिलने पर राधाबाई, हीराबाई, उत्तरा बाई और कमलाबाई भी मौके पर पहुंचीं। आरोप है कि इसके बाद आरोपियों ने लाठी, तलवार, कुल्हाड़ी, चाकू और लोहे की रॉड जैसे हथियारों से हमला कर दिया।

सरकारी पक्ष के अनुसार कामता राठौर, कौशल, नेगीराम, सुनील, दिनेश, बबला, बैलिस्टर, दिलीप, बनवासी, अनिल पांडे, लाली चौहान और जुगुनू समेत अन्य लोगों ने मिलकर हमला किया।

महिलाएं भी हुईं घायल, कई लोगों को आए गंभीर चोट

मारपीट में राधाबाई, हीराबाई, उत्तरा बाई और कमलाबाई को भी चोटें आईं। वहीं विष्णु प्रसाद जमीन पर गिर पड़े, जिन्हें आरोपी मृत समझकर मौके से फरार हो गए।

घटना में कमल राठौर और विनोद को गंभीर चोटें आई थीं, जिनमें फ्रैक्चर भी शामिल था। बाद में पुलिस ने घायलों को अस्पताल पहुंचाया और मामले की जांच के बाद कोर्ट में चालान पेश किया।

2008 में हुई थी सजा

जांजगीर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 17 मार्च 2008 को आरोपियों को दोषी करार दिया था। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 147 और 148 के तहत एक-एक वर्ष तथा धारा 326/149 के तहत तीन वर्ष की सजा सुनाई थी। साथ ही 2500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।

हाईकोर्ट ने बदली सजा

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान माना कि घटना वर्ष 2005 की है और अपील 2008 से लंबित थी। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी पहले ही एक महीने से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जेल में बिताई अवधि को ही पर्याप्त सजा माना और आरोपियों को राहत प्रदान की।

TNA DESK

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