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दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट का अहम फैसला…सबूतों में कमी पर आरोपी को मिली राहत

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बिलासपुर : से सामने आए एक अहम न्यायिक फैसले में हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने पूरे मामले की विस्तार से समीक्षा करने के बाद यह निर्णय सुनाया।

यह मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां वर्ष 2003 में एक 20 वर्षीय युवती ने मूलचंद नामक व्यक्ति पर जबरदस्ती करने का आरोप लगाया था।

पीड़िता ने लगाए थे गंभीर आरोप

शिकायत के अनुसार, आरोपी ने देर रात युवती को घर से बाहर खींचकर खेत में ले जाकर उसके साथ जबरन संबंध बनाए और जान से मारने की धमकी भी दी।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए धारा 376 के तहत 7 वर्ष की सजा और धारा 506 बी के तहत 6 माह की अतिरिक्त सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में अपील के बाद बदला फैसला

आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान में कई विरोधाभास और असंगतियां हैं, जिससे उसकी गवाही पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती।

फैसले को प्रभावित करने वाले अहम बिंदु

कोर्ट ने अपने निर्णय में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान दिया

  • घटना के 2 से 3 दिन बाद पीड़िता और आरोपी को एक साथ देखा गया
  • ग्रामीणों के हस्तक्षेप के बाद दोनों साथ रहने लगे
  • पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि यदि आरोपी उसे स्वीकार कर लेता तो शिकायत दर्ज नहीं कराई जाती
  • मेडिकल जांच में शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं पाई गई
  • जबरदस्ती के स्पष्ट संकेत भी रिपोर्ट में नहीं मिले
  • एफएसएल रिपोर्ट भी आरोपी के खिलाफ नहीं गई
  • घटना स्थल रिहायशी इलाके में होने के बावजूद किसी ने शोर नहीं सुना
  • लगभग 8 दिन बाद शिकायत दर्ज हुई, जिसे पंचायत की वजह बताया गया, लेकिन अदालत को यह कारण संतोषजनक नहीं लगा

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि तभी संभव है, जब वह पूरी तरह सुसंगत, विश्वसनीय और संदेह से परे हो। इस मामले में ऐसा नहीं पाया गया, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

न्यायिक दृष्टिकोण का संकेत

यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में सबूतों की मजबूती और गवाही की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने दोहराया कि न्याय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस प्रमाणों के आधार पर ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

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